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Tuesday, March 16, 2010

ये नज़्म है, ग़ज़ल है...क्या है मैं नहीं जानता...किसने लिखी है, उसे भी मैं नहीं जानता..

तेरी डोली उठी


मेरी मय्यत उठी




फूल तुझ पर भी बरसे


फूल मुझ पर भी बरसे




फ़र्क सिर्फ़ इतना सा था


तू सज गई


मुझे सजाया गया






तू भी नए घर को चली


मैं भी नए घर को चला






फ़र्क सिर्फ़ इतना सा था


तू उठ के गई


मुझे उठाया गया






महफ़िल वहां भी थी,


लोग यहां भी थे






फ़र्क सिर्फ़ इतना सा था


उनका हंसना वहां


इनका रोना यहां






काज़ी उधर भी था, मौलवी इधर भी था


दो बोल तेरे पढ़े, दो बोल मेरे पढ़े


तेरा निकाह पढ़ा, मेरा जनाज़ा पढ़ा






फ़र्क सिर्फ़ इतना सा था


तुझे अपनाया गया


मुझे दफ़नाया गया    ||||